“इलाज के समय अपराध नहीं, इंसान देखा जाएगा” — ICU में हथकड़ी पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक रोक और मानवीय गरिमा का संवैधानिक विस्तार
(सुप्रीम कोर्ट का निर्णय | 11 फरवरी 2025)
प्रस्तावना
भारतीय संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह मानव गरिमा, करुणा और न्याय का जीवंत दस्तावेज़ है। समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि अपराधी भी नागरिक होता है और उसके मौलिक अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं होते। 11 फरवरी 2025 को दिया गया सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इसी संवैधानिक दर्शन की एक सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें न्यायालय ने कहा कि ICU या अस्पताल में इलाज के दौरान किसी भी मरीज को—चाहे वह कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो—हथकड़ी या जंजीर से बांधना असंवैधानिक और अमानवीय है।
यह फैसला केवल पुलिस प्रक्रिया या जेल प्रशासन से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार, चिकित्सा नैतिकता और राज्य की संवेदनशीलता पर एक व्यापक संवैधानिक घोषणा है।
मामले की पृष्ठभूमि
देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे मामले सामने आ रहे थे जहाँ गंभीर अपराधों के आरोपित या दोषसिद्ध व्यक्तियों को अस्पताल में इलाज के दौरान हथकड़ी पहनाई गई, यहाँ तक कि ICU जैसे संवेदनशील वार्डों में भी उन्हें जंजीरों से बांधकर रखा गया। कई मामलों में मरीज वेंटिलेटर पर थे, चलने-फिरने की स्थिति में नहीं थे, फिर भी सुरक्षा के नाम पर उन्हें शारीरिक बंधनों में रखा गया।
इन घटनाओं ने यह गंभीर प्रश्न खड़ा किया कि—
- क्या सुरक्षा का अधिकार मानव गरिमा से ऊपर हो सकता है?
- क्या इलाज के दौरान भी व्यक्ति को अपराधी की तरह ट्रीट किया जा सकता है?
- क्या हथकड़ी वास्तव में सुरक्षा का एकमात्र साधन है?
इन्हीं सवालों के जवाब में यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट और कठोर रुख
सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा—
“ICU में इलाजरत किसी भी व्यक्ति को हथकड़ी या जंजीर से बांधना न केवल अनुचित है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है।”
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि इलाज के समय व्यक्ति की पहचान अपराधी नहीं, बल्कि मरीज के रूप में होती है।
निर्णय की प्रमुख बातें
1. ICU में हथकड़ी पूर्णतः प्रतिबंधित
अदालत ने कहा कि ICU जीवन और मृत्यु के बीच का क्षेत्र है। वहाँ किसी भी प्रकार की हथकड़ी—
- इलाज में बाधा डालती है
- मानसिक आघात पहुँचाती है
- डॉक्टरों के कार्य में रुकावट बनती है
- और सबसे बढ़कर, मानव गरिमा को ठेस पहुँचाती है
इसलिए ICU में हथकड़ी या जंजीर किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
2. अपराध की गंभीरता अप्रासंगिक
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- हत्या,
- आतंकवाद,
- संगठित अपराध
जैसे गंभीर अपराधों के आरोपी भी इलाज के समय मानवीय गरिमा के अधिकारी हैं। अपराध की प्रकृति इलाज के अधिकार को सीमित नहीं कर सकती।
3. इलाज के समय राज्य का कर्तव्य
न्यायालय ने कहा कि राज्य का दायित्व केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि—
- जीवन की रक्षा
- सम्मानजनक उपचार
- अमानवीय व्यवहार से संरक्षण
भी राज्य के संवैधानिक दायित्व हैं।
संवैधानिक आधार
यह निर्णय मुख्यतः अनुच्छेद 21 पर आधारित है, जो कहता है—
“किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा वंचित नहीं किया जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई मामलों में स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 21 में ‘मानवीय गरिमा के साथ जीवन’ शामिल है।
इसके साथ ही—
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
- अनुच्छेद 20 और 22 (गिरफ्तारी और दंड प्रक्रिया में संरक्षण)
को भी इस निर्णय का आधार बनाया गया।
मानवाधिकार दृष्टिकोण
अदालत ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों की भावना को भी स्वीकार किया, जिनमें कहा गया है कि—
- कैदी भी इंसान होता है
- शारीरिक बंधन केवल अंतिम और अपरिहार्य उपाय हो सकता है
- चिकित्सा परिस्थितियों में बंधन अत्यंत अपवादात्मक होने चाहिए
ICU में हथकड़ी को अदालत ने क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार की श्रेणी में रखा।
चिकित्सा नैतिकता और डॉक्टरों की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- डॉक्टर का पहला कर्तव्य मरीज के प्रति होता है
- हथकड़ी मरीज की मानसिक स्थिति को बिगाड़ सकती है
- इससे इलाज की गुणवत्ता प्रभावित होती है
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि डॉक्टर को लगता है कि हथकड़ी इलाज में बाधा बन रही है, तो डॉक्टर की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सुरक्षा बनाम गरिमा — संतुलन का सिद्धांत
अदालत ने यह नहीं कहा कि सुरक्षा आवश्यक नहीं है। लेकिन कोर्ट ने यह ज़ोर देकर कहा कि—
“सुरक्षा के नाम पर गरिमा की बलि नहीं दी जा सकती।”
कोर्ट ने वैकल्पिक उपाय सुझाए—
- पर्याप्त पुलिस एस्कॉर्ट
- अस्पताल परिसर में निगरानी
- जोखिम-आधारित सुरक्षा व्यवस्था
- हथकड़ी के बजाय मानवीय निगरानी
राज्य सरकारों को सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि—
- अस्पतालों में कैदी-मरीजों के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएँ
- ICU में हथकड़ी पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाया जाए
- पुलिस और जेल अधिकारियों के लिए मानवाधिकार प्रशिक्षण अनिवार्य हो
- नियमों के उल्लंघन पर जवाबदेही और अनुशासनात्मक कार्रवाई तय हो
इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव
- अस्पतालों में मानवीय वातावरण मजबूत होगा
- पुलिस और जेल प्रशासन अधिक संवेदनशील बनेगा
- कैदी-मरीजों के अधिकार सुरक्षित होंगे
- न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास बढ़ेगा
आलोचनाएँ और उनका उत्तर
कुछ लोगों का तर्क है कि इससे सुरक्षा जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि—
- हर मरीज भागने की स्थिति में नहीं होता
- ICU में मरीज शारीरिक रूप से असमर्थ होता है
- आधुनिक सुरक्षा उपाय हथकड़ी से कहीं अधिक प्रभावी हैं
न्यायिक परंपरा में इस फैसले का स्थान
यह फैसला—
- जेल सुधार
- पुलिस सुधार
- मानवाधिकार न्यायशास्त्र
की दिशा में एक मील का पत्थर माना जाएगा। यह निर्णय बताता है कि भारतीय न्यायपालिका दंड के साथ करुणा को भी समान महत्व देती है।
निष्कर्ष
11 फरवरी 2025 का यह फैसला केवल ICU में हथकड़ी पर रोक नहीं है, बल्कि यह एक गहरा संवैधानिक संदेश है—
“इलाज के वक्त अपराध नहीं, इंसान देखा जाएगा।”
यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि कानून की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मानवता में है। जब राज्य सबसे कमजोर स्थिति में खड़े व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, तभी न्याय वास्तव में जीवित रहता है।