“आवारा कुत्तों की समस्या: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, नगर निकायों की लापरवाही पर फोकस, और मानव-पशु संतुलन की चुनौती”
भारत में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) के खतरे और उनसे जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई की, जिसमें न्यायालय ने न केवल नगर पालिकाओं की विफलता को स्पष्ट रूप से चिन्हित किया, बल्कि मानव व पशु कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने की कठिनाई पर भी गहरा विचार व्यक्त किया।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि मामला क्या है, कोर्ट ने क्या टिप्पणियाँ कीं, किन नियमों की बात हो रही है, किन पक्षों के तर्क सुने गए और आगे क्या संभावनाएँ हैं।
1. पृष्ठभूमि और मामला
भारत में आवारा कुत्तों की संख्या लाखों में है और यह समस्या शहरों के साथ-साथ छोटे कस्बों तथा गावों तक विस्तारित हो चुकी है। आवारा कुत्तों के काटने, रेबीज़ संक्रमण और सड़क दुर्घटनाओं जैसे कई सुरक्षा जोखिमों के चलते यह विषय अक्सर सुर्खियों में रहता है।
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में तब हुई जब एक याचिका दायर की गई कि आवारा कुत्तों से सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु पूर्व घोषित नियमों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए। मुख्य रूप से यह याचिकाएँ Animal Birth Control (ABC) Rules, 2001 से जुड़ी हैं, जिनके तहत आवारा कुत्तों को पकड़ा, नसबंदी किया, टीका लगाया और फिर सुरक्षित तरीके से छोड़ा जाना है।
कोर्ट ने इस मुद्दे पर आज विस्तृत सुनवाई की, जिसमें तीन जजों की बेंच — न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया — ने मामले की गहराई से जांच की।
2. सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जिनका संबंध न केवल कानूनी नियमों से था बल्कि मानव-पशु व्यवहार की मौलिक समझ से भी था:
(क) नगर निकायों की लापरवाही पर तीव्र टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि नगर निगम और नगरपालिका प्राधिकरणों ने आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान करने में विफलता दिखाई है, जिससे जनता की सुरक्षा खतरे में पड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह विफलता वर्षों से चली आ रही है और अब इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि नगर निकायों का यह दायित्व है कि वे ABC नियमों का पर्याप्त पालन कराएँ और आवारा कुत्तों को नियंत्रित कर सकें — न कि सिर्फ दिखावे के लिए रिपोर्टें जमा करें या फाइलों में संख्याएँ भरें।
(ख) “कुत्ता डर या पहले काटे जाने को सूंघता है और हमले कर देता है”
सुनवाई का सबसे चर्चित भाग तब आया जब न्यायालय ने कुत्तों के व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए कहा:
“कुत्ता उस इंसान को हमेशा सूंघ सकता है जो कुत्तों से डरता है; जैसे ही वह डर को महसूस करेगा वह आक्रमण कर सकता है। यह हम व्यक्तिगत अनुभव से कह रहे हैं।”
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि डर और पिछले कुत्ते के काटे होने की याद कुत्तों को आक्रामक बना सकती है। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट में मौजूद कुछ पशु-प्रेमियों ने इस बात से असहमति व्यक्त की, तो कोर्ट ने स्पष्ट कहा:
“डर के संकेत को महसूस कर हमले की संभावना बढ़ जाती है; यह आपके पालतू कुत्ते पर भी लागू होता है।”
यह टिप्पणी केवल कुत्तों के व्यवहार पर वैज्ञानिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि मानव-पशु बातचीत की जटिलताओं को उजागर करने वाली महत्वपूर्ण बात थी।
(ग) स्थानीय निकायों को कड़ी चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने सभी कुत्तों को हर सड़क से हटाने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि केवल संस्थागत परिसरों (जैसे अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन आदि) से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए हैं ताकि इन संवेदनशील क्षेत्रों में नागरिकों की सुरक्षा बनी रहे।
कोर्ट का रुख यह भी था कि सरकार और नगर निकायों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि:
- उन्हें ABC नियमों का पालन करने का दायित्व समझ में आए,
- आवारा कुत्तों के टीकाकरण, नसबंदी और सुरक्षित प्रबंधन के लिए पर्याप्त योजना बनाई जाए,
- सार्वजनिक स्थानों पर उनके रहने/खाने की आदतों से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जाए।
3. पक्षकारों के तर्क और बहस
सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों ने अपने तर्क प्रस्तुत किए:
(क) नागरिकों और सुरक्षा की चिंता
कुछ वकीलों ने कहा कि आवारा कुत्तों की संख्या में वृद्धि और उनकी आक्रामकता लोगों के लिए बहुत गंभीर समस्या बन चुकी है। उदाहरण के लिए, एक वकील ने कोर्ट को बताया कि एक ही कुत्ता कई बार अलग-अलग लोगों पर हमला कर चुका है, जिसमें छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल हैं, क्योंकि इसे उसी इलाके में छोड़ा गया था जहां इसे पकड़ा गया था।
उनका तर्क था कि यदि कुत्तों को वहीं छोड़ा जाता है, तो वे फिर से उसी क्षेत्र में पैदा होंगे, जिससे समस्या जस की तस बनी रहेगी। अतः इन लोगों ने यह सुझाव दिया कि कम-से-कम सार्वजनिक स्थानों पर खाना खिलाना बंद होना चाहिए और सुरक्षा उपाय लागू किए जाने चाहिए।
(ख) नगर प्राधिकरणों और नियमों का अनुपालन
एक अन्य पक्ष ने यह कहा कि ABC नियमों का पालन पर्याप्त नहीं है और वर्तमान व्यवस्था में नगर निकायों से अपेक्षित कार्यवाही नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि नियम खुद गंभीर हैं, लेकिन उन्हें लागू करने की नीति और ढांचा पर्याप्त नहीं है।
इस पर वरिष्ठ वकील ने सुझाव दिया कि यदि निगमों के पास आवश्यक पूर्वाधार, प्रशिक्षण और बजट स्रोत हों, तो यह समस्या बेहतर तरीके से प्रबंधित हो सकती है। उदाहरण के लिए, पशु चिकित्सकों को विशेष प्रशिक्षण, CSR फंड का उपयोग, और नगरपालिका के अधिकारियों द्वारा मानकीकृत SOP स्थापित करना शामिल हो सकता है।
(ग) पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के तर्क
एक ओर पशु अधिकार कार्यकर्ता और डॉग-लवर्स ने कुत्तों के पक्ष में यह तर्क दिया कि उन्हें केवल दोषी नहीं ठहराना चाहिए और यह कि कुत्तों का जीवन और स्वतंत्रता भी महत्वपूर्ण है। कई ने यह भी दावा किया कि कुत्तों को हर सार्वजनिक जगह से हटाना न केवल अमानवीय है बल्कि इससे पर्यावरण-संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
यह बहस सुप्रीम कोर्ट तक इस बात को ले आई कि मानव सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखना कितना कठिन है।
4. समुदाय और प्रशासन की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में यह भी पूछा कि क्या आवारा कुत्तों को माइक्रोचिप करने जैसे आधुनिक उपाय अपनाए जा रहे हैं ताकि उनके नियंत्रण में सुधार हो सके, या क्या स्थानीय प्रशासन इस दिशा में काम कर रहा है।
कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने को कहा कि:
- नगर निकाय ABC नियमों का पालन सुनिश्चित करें,
- संवेदनशील क्षेत्रों में कुत्तों की उपस्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी प्रबंधन रणनीतियाँ अपनाई जाएँ,
- समुदाय आधारित समाधान और स्थानीय सरकारों द्वारा नियमित निरीक्षणें हो।
5. आगे की सुनवाई और संभावित दिशा
कोर्ट ने सुनवाई को आगे जारी रखने का आदेश दिया है और सभी पक्षों से कहा कि वे एक विशेष रिपोर्ट पर आधारित अपनी दलीलें तैयार करें — उस रिपोर्ट में आवारा कुत्तों के व्यवहार, ABC नियमों के अनुपालन, और नागरिक सुरक्षा तक पहुँच के मुद्दों का विश्लेषण शामिल है।
यह रिपोर्ट कानून-व्यवस्था, पशु व्यवहार विज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक कार्यान्वयन के परिप्रेक्ष्य में तैयार की जा रही है।
6. निष्कर्ष: समस्या का संतुलित समाधान आवश्यक
आज की सुनवाई से यह स्पष्ट हो गया है कि आवारा कुत्तों का मुद्दा सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक, प्रशासनिक, वैज्ञानिक, और मानवीय समस्या भी है। सुप्रीम कोर्ट ने:
नगर निकायों की जिम्मेदारी पर ज़ोर दिया,
मानव सुरक्षा को प्राथमिकता दी,
पशु अधिकारों को ध्यान में रखा,
व्यवहार विज्ञान को भी अपनी टिप्पणियों में शामिल किया।
यह केस बताता है कि लोकतंत्र में कानून, प्रशासन और समाज को मिलकर ऐसे जटिल मुद्दों का समाधान निकालना पड़ता है — जो कि मानव-पशु सह अस्तित्व (co-existence) को संरक्षित कर सके।