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“आजीविका के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता”: नाबालिग पुत्री से बलात्कार के दोषी लेखपाल की आजीवन कारावास की सज़ा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की रोक

“आजीविका के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता”: नाबालिग पुत्री से बलात्कार के दोषी लेखपाल की आजीवन कारावास की सज़ा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की रोक — POCSO कानून, न्यायिक विवेक और संवैधानिक संतुलन पर गंभीर बहस

भूमिका

        भारतीय न्याय व्यवस्था में यौन अपराधों, विशेषकर नाबालिगों के विरुद्ध अपराधों को अत्यंत गंभीरता से लिया जाता है। इसी उद्देश्य से बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) अस्तित्व में आया, ताकि बच्चों के खिलाफ यौन शोषण के मामलों में कठोर दंड और शीघ्र न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

        किन्तु हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक आदेश न्यायिक और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर व्यापक बहस का विषय बन गया है। इस आदेश में हाईकोर्ट ने अपनी नाबालिग पुत्री से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए गए एक लेखपाल की सजा और दोषसिद्धि को निलंबित करते हुए उसे जमानत प्रदान की।

न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि—

“अपील लंबित रहने के दौरान अभियुक्त के आजीविका के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।”

यह टिप्पणी न केवल संवैधानिक अधिकारों, बल्कि POCSO कानून की भावना, पीड़ित के अधिकारों और न्यायिक विवेक की सीमाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।


मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर प्रदेश के एक जिले से संबंधित है, जहाँ एक राजस्व विभाग में कार्यरत लेखपाल पर आरोप लगाया गया कि उसने अपनी नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार किया।

निचली अदालत का निर्णय

  • ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को
    • धारा 376 IPC
    • POCSO अधिनियम की सुसंगत धाराओं
      के अंतर्गत दोषी ठहराया।
  • अदालत ने अभियुक्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
  • दोषसिद्धि के आधार के रूप में पीड़िता के बयान और मेडिकल साक्ष्य को स्वीकार किया गया।

हाईकोर्ट में अपील और जमानत याचिका

दोषसिद्धि के बाद अभियुक्त ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की और साथ ही

  • सजा के निलंबन (Suspension of Sentence)
  • दोषसिद्धि पर रोक (Suspension of Conviction)
    की प्रार्थना की।

अभियुक्त पक्ष के प्रमुख तर्क

अभियुक्त की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने निम्नलिखित दलीलें प्रस्तुत कीं:

1. झूठा मामला और वैवाहिक विवाद

  • यह मामला पत्नी द्वारा दायर तलाक याचिका का “काउंटरब्लास्ट” है।
  • पत्नी और बेटी के बयान में गंभीर विरोधाभास हैं।

2. साक्ष्यों में असंगति

  • पीड़िता के बयानों में समय, स्थान और घटना के तरीके को लेकर विरोधाभास।
  • मेडिकल साक्ष्य अभियोजन के कथन का पूर्ण समर्थन नहीं करते।

3. लंबित अपील और देरी

  • अपील के निस्तारण में वर्षों लग सकते हैं।
  • इस दौरान अभियुक्त को जेल में रखना अनुचित और अन्यायपूर्ण होगा।

4. आजीविका का अधिकार

  • अभियुक्त सरकारी कर्मचारी है।
  • दोषसिद्धि के चलते वह नौकरी खो चुका है।
  • यदि जमानत नहीं मिली तो उसका जीवन-यापन असंभव हो जाएगा

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य की ओर से उपस्थित अपर महाधिवक्ता (AGA) ने जमानत का विरोध तो किया, लेकिन:

  • बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए मुख्य तथ्यों और विरोधाभासों का प्रभावी खंडन नहीं कर सके।
  • यह भी स्वीकार किया कि अपील शीघ्र सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय

न्यायमूर्ति द्वारा पारित आदेश में कहा गया—

1. दोषसिद्धि पर अंतरिम रोक

  • अदालत ने कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान
    दोषसिद्धि और सजा को निलंबित किया जा सकता है

2. आजीविका का अधिकार (Article 21)

  • संविधान का अनुच्छेद 21

    “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार”
    केवल शारीरिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है।

  • इसमें आजीविका कमाने का अधिकार भी सम्मिलित है।

3. न्यायिक संतुलन

  • अदालत ने माना कि
    • अपराध गंभीर है,
    • लेकिन अपील लंबित रहने तक अभियुक्त को पूरी तरह आजीविका से वंचित करना उचित नहीं।

4. जमानत की शर्तें

  • अभियुक्त को सशर्त जमानत दी गई।
  • पीड़िता से संपर्क न करने और मुकदमे को प्रभावित न करने का निर्देश।

POCSO कानून की भावना बनाम न्यायिक विवेक

यह निर्णय एक गंभीर प्रश्न उठाता है—

क्या POCSO जैसे कठोर कानून में भी दोषसिद्धि निलंबित की जा सकती है?

कानूनी स्थिति

  • सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में कहा है कि
    • सजा निलंबन अपवाद है, नियम नहीं।
  • लेकिन धारा 389 CrPC के अंतर्गत उच्च न्यायालय को यह विवेकाधिकार प्राप्त है।

पीड़िता के अधिकार और सामाजिक प्रभाव

इस आदेश के बाद कई चिंताएँ उभरी हैं:

1. पीड़िता की सुरक्षा

  • अभियुक्त पीड़िता का पिता है।
  • जमानत पर बाहर आना पीड़िता के लिए
    मानसिक और सामाजिक खतरा पैदा कर सकता है।

2. गलत संदेश

  • समाज में यह संदेश जा सकता है कि
    गंभीर यौन अपराधों में भी सजा टाली जा सकती है।

3. POCSO की प्रभावशीलता

  • यदि ऐसे मामलों में दोषसिद्धि निलंबित होती रही,
    तो कानून की निरोधात्मक शक्ति कमजोर हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों से तुलना

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है—

  • Atul Tripathi v. State of UP
    • सजा निलंबन में अपराध की प्रकृति, साक्ष्य और समाज पर प्रभाव देखा जाना चाहिए।
  • State of Maharashtra v. Madhukar Wamanrao Smarth
    • यौन अपराधों में न्यायालय को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए।

न्यायिक विवेक बनाम सार्वजनिक आक्रोश

यह मामला स्पष्ट करता है कि—

  • न्यायालय भावनाओं से नहीं, कानून से चलता है
  • लेकिन कानून का प्रयोग ऐसा हो कि
    • पीड़ित का विश्वास डगमगाए नहीं,
    • और समाज में न्याय की धारणा बनी रहे।

निष्कर्ष

     इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की जटिलता और संतुलन को दर्शाता है।

एक ओर—

  • अभियुक्त के संवैधानिक अधिकार,
  • अपील लंबित रहने की वास्तविकता,
  • और न्यायिक विवेक।

दूसरी ओर—

  • नाबालिग पीड़िता का अधिकार,
  • POCSO कानून की कठोरता,
  • और सामाजिक न्याय की अपेक्षा।

       यह निर्णय अंतिम नहीं है। अंतिम सत्य अपील के निर्णय के साथ सामने आएगा। लेकिन यह आदेश निश्चित रूप से यह दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका में कानून, संवेदना और विवेक के बीच संतुलन साधना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है।