अस्थायी आय, आत्मनिर्भरता और भरण-पोषण का अधिकार: धारा 144 बीएनएसएस के संदर्भ में केरल उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय
भूमिका
भारतीय पारिवारिक कानून में भरण-पोषण (Maintenance) केवल एक वैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा विषय है। विवाह-विच्छेद, अलगाव या वैवाहिक विवाद की स्थिति में पत्नी और बच्चों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य और न्यायपालिका की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी रही है।
हालाँकि, समय के साथ एक जटिल प्रश्न उभरकर सामने आया है—यदि पत्नी किसी प्रकार की आय अर्जित कर रही हो, भले ही वह अस्थायी या अपर्याप्त हो, तो क्या वह फिर भी भरण-पोषण की हकदार होगी?
एर्नाकुलम स्थित केरल उच्च न्यायालय ने इसी संवेदनशील प्रश्न पर एक विस्तृत और संतुलित निर्णय दिया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि केवल यह तथ्य कि पत्नी अस्थायी या अनियमित नौकरी से कुछ आय अर्जित कर रही है, अपने-आप में उसे धारा 144 बीएनएसएस (पूर्व में धारा 125 सीआरपीसी) के तहत भरण-पोषण का अधिकार नहीं देता। यह फैसला पत्नी की आत्मनिर्भरता, पति की जिम्मेदारी और बच्चों के सर्वोत्तम हित—तीनों के बीच संतुलन स्थापित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मूल रूप से जीशा पी (पत्नी) और उनके दो नाबालिग बच्चों—रंतिन पी और डीजो राज—द्वारा थलास्सेरी पारिवारिक न्यायालय में दायर याचिका संख्या 45/2017 से उत्पन्न हुआ। याचिका दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 तथा हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 के अंतर्गत दाखिल की गई थी।
पत्नी ने अपने लिए 15,000 रुपये प्रतिमाह और प्रत्येक बच्चे के लिए 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की। उनका दावा था कि पति के पास पर्याप्त साधन हैं, जबकि वह स्वयं आर्थिक रूप से असुरक्षित स्थिति में हैं।
पारिवारिक न्यायालय का निर्णय
पारिवारिक न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद—
- पत्नी के भरण-पोषण के दावे को अस्वीकार कर दिया,
- जबकि दोनों नाबालिग बच्चों के लिए 6,000 रुपये प्रतिमाह प्रति बच्चा भरण-पोषण निर्धारित किया।
न्यायालय का मत था कि पत्नी अपने जीवन-यापन के लिए स्वयं सक्षम है, जबकि बच्चों की देखभाल और शिक्षा हेतु भरण-पोषण आवश्यक है।
पुनरीक्षण याचिकाओं का दाखिल होना
इस निर्णय से दोनों पक्ष असंतुष्ट रहे—
- पत्नी ने आरपीएफसी संख्या 409/2017 दाखिल कर अपने लिए भरण-पोषण तथा बच्चों के लिए निर्धारित राशि में वृद्धि की मांग की।
- पति राजीव एम ने आरपीएफसी संख्या 476/2017 दायर कर बच्चों को दिए गए भरण-पोषण को अत्यधिक बताते हुए उसे कम करने की मांग की।
इन दोनों पुनरीक्षण याचिकाओं की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति डॉ. कौसर एडप्पागथ द्वारा एक साथ की गई।
पत्नी की ओर से प्रस्तुत तर्क
पत्नी के अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि—
- पत्नी के पास कोई स्थायी या नियमित आय का स्रोत नहीं है।
- दर्जी होने का अर्थ यह नहीं कि वह निरंतर और पर्याप्त आय अर्जित कर रही है।
- पारिवारिक न्यायालय ने यह मानकर गंभीर त्रुटि की कि पत्नी आत्मनिर्भर है।
अधिवक्ता ने धारा 125 सीआरपीसी (अब धारा 144 बीएनएसएस) के सामाजिक न्याय के उद्देश्य पर बल देते हुए कहा कि इसका मकसद महिलाओं और बच्चों को दरिद्रता और परित्याग से बचाना है।
पति की ओर से प्रस्तुत तर्क
पति के वकील ने इसके विपरीत तर्क देते हुए कहा कि—
- पत्नी दर्जी के रूप में कार्य करती है और उसकी अपनी आय है।
- वह दर्जी संघ की सदस्य भी रही है, जिससे यह सिद्ध होता है कि वह रोजगार से जुड़ी रही है।
- हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 20(3) के अनुसार बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की समान रूप से होती है।
- बच्चों को 6,000 रुपये प्रति माह देना पति की आय की तुलना में अत्यधिक बोझ डालता है।
पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार पर उच्च न्यायालय की विवेचना
केरल उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया और यह स्वीकार किया कि—
- विवाह प्रमाण-पत्र में पत्नी का पेशा दर्जी बताया गया था।
- वह दर्जी संघ की सदस्य भी रही थी।
किन्तु न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पेशा या क्षमता होना और वास्तव में नियमित आय अर्जित करना—दो अलग-अलग बातें हैं।
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें शामिल हैं—
- रजनेश बनाम नेहा
- सुनीता कछवाहा बनाम अनिल कछवाहा
- शैलजा बनाम खोब्बन्ना
इन निर्णयों का सार यह है कि—
यदि पत्नी आय अर्जित करने में सक्षम है या कुछ आय अर्जित कर रही है, फिर भी यदि वह आय उसके जीवन-निर्वाह के लिए अपर्याप्त है, तो उसे स्वतः भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
फिर भी पत्नी को भरण-पोषण क्यों नहीं मिला?
उच्च न्यायालय ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि—
- इस मामले में पारिवारिक न्यायालय का निष्कर्ष मनमाना या अवैध नहीं है।
- पत्नी के स्वयं के साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि वह पूर्णतः आश्रित नहीं है।
- धारा 144 बीएनएसएस का उद्देश्य पूरी तरह निराश्रित व्यक्ति की रक्षा करना है, न कि हर वैवाहिक विवाद में भरण-पोषण को स्वचालित अधिकार बना देना।
इस प्रकार, अदालत ने पत्नी के भरण-पोषण से इनकार करने के निर्णय में हस्तक्षेप से इंकार कर दिया।
बच्चों के भरण-पोषण पर न्यायालय का दृष्टिकोण
जहाँ तक बच्चों के भरण-पोषण का प्रश्न है, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- नाबालिग बच्चों का भरण-पोषण माता-पिता की संयुक्त और अनिवार्य जिम्मेदारी है।
- बच्चों की शिक्षा, पोषण और समग्र विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अदालत ने पारिवारिक न्यायालय द्वारा निर्धारित 6,000 रुपये प्रति बच्चा प्रतिमाह की राशि को उचित और न्यायसंगत माना और पति की पुनरीक्षण याचिका को भी खारिज कर दिया।
धारा 144 बीएनएसएस और बदलता न्यायिक दृष्टिकोण
यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता (बीएनएसएस) के तहत भी न्यायालय—
- पत्नी की वास्तविक आर्थिक स्थिति को देखेगा,
- केवल अस्थायी या नाममात्र आय के आधार पर स्वतः भरण-पोषण नहीं देगा,
- और आत्मनिर्भरता को भी एक प्रासंगिक कारक मानेगा।
व्यापक प्रभाव और कानूनी महत्व
इस फैसले के दूरगामी प्रभाव होंगे—
- भरण-पोषण मामलों में तथ्य-आधारित और यथार्थवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलेगा।
- पत्नी की क्षमता और वास्तविक आय के बीच अंतर को समझने की न्यायिक परंपरा मजबूत होगी।
- बच्चों के अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति और सुदृढ़ होगी।
निष्कर्ष
केरल उच्च न्यायालय का यह निर्णय यह स्पष्ट संदेश देता है कि भरण-पोषण कानून न तो दंडात्मक है और न ही यांत्रिक। यह सामाजिक न्याय का उपकरण है, जिसका प्रयोग प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुरूप किया जाना चाहिए।
अस्थायी या अपर्याप्त आय होने मात्र से पत्नी को स्वतः भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिल जाता, लेकिन बच्चों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
यह फैसला पारिवारिक कानून में संतुलन, निष्पक्षता और व्यावहारिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।