अरावली हिल्स की संशोधित परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का सूओ मोटो हस्तक्षेप: पर्यावरण संरक्षण, न्यायिक निर्देश और विकास–संतुलन पर ऐतिहासिक विमर्श
प्रस्तावना
अरावली पर्वतमाला (Aravalli Hills) न केवल भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, बल्कि यह उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन, जल सुरक्षा, जैव-विविधता और मरुस्थलीकरण की रोकथाम के लिए एक जीवनरेखा मानी जाती है। हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला दशकों से खनन, अतिक्रमण और अनियंत्रित शहरीकरण के कारण गंभीर खतरे में है।
इसी पृष्ठभूमि में, सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को अरावली हिल्स की संशोधित परिभाषा (Revised Definition) को लेकर उत्पन्न भ्रम और चिंताओं पर सूओ मोटो (Suo Motu) संज्ञान लेते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके पूर्व निर्देशों और विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को गलत तरीके से समझा और प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य को क्षति पहुंच सकती है।
यह लेख इस पूरे घटनाक्रम का विस्तृत, विधिक, पर्यावरणीय और नीतिगत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
अरावली पर्वतमाला: पर्यावरणीय महत्व
अरावली पर्वतमाला का महत्व केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय और जलवायु संबंधी है:
- यह थार मरुस्थल के विस्तार को रोकती है
- दिल्ली–एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहायक
- भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का प्रमुख स्रोत
- वन्यजीवों और जैव-विविधता का प्राकृतिक आवास
इसलिए अरावली का संरक्षण केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के जीवन के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।
अरावली की परिभाषा का विवाद: मूल समस्या
पिछले कुछ वर्षों में यह विवाद उभरा कि:
- अरावली हिल्स की कानूनी परिभाषा क्या हो?
- क्या केवल पहाड़ी संरचना (Hill Formation) ही अरावली मानी जाए?
- या फिर उससे जुड़े वन, घाटियाँ, पठार और पारिस्थितिक क्षेत्र भी?
राज्य सरकारों और विकास एजेंसियों द्वारा यह तर्क दिया जाने लगा कि:
“यदि कोई क्षेत्र स्पष्ट रूप से पहाड़ी नहीं है, तो वह अरावली का हिस्सा नहीं माना जा सकता।”
यही संकीर्ण व्याख्या खनन, रियल एस्टेट और औद्योगिक गतिविधियों के लिए रास्ता खोलने लगी।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देश
सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका था कि:
- अरावली की व्याख्या केवल भू-आकृति तक सीमित नहीं हो सकती
- इसके पारिस्थितिक (Ecological) और पर्यावरणीय स्वरूप को भी ध्यान में रखना होगा
- राज्य सरकारें मनमाने ढंग से इसकी सीमाएँ तय नहीं कर सकतीं
इसी संदर्भ में एक विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) का गठन किया गया था, ताकि वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से अरावली की परिभाषा तय की जा सके।
विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और उत्पन्न भ्रम
विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुछ तकनीकी शब्दों और वैज्ञानिक मानकों का प्रयोग किया। लेकिन समस्या यह उत्पन्न हुई कि:
- रिपोर्ट के कुछ अंशों को चयनात्मक रूप से पढ़ा गया
- अदालत की टिप्पणियों को अनुमति या ढील के रूप में प्रस्तुत किया गया
- यह प्रचारित किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की परिभाषा को “संकीर्ण” कर दिया है
यही कारण था कि पर्यावरणविदों, नागरिक समाज और विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता व्यक्त की।
सुप्रीम कोर्ट का सूओ मोटो संज्ञान
इन चिंताओं को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं (Suo Motu) इस विषय पर मामला शुरू किया। 29 दिसंबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि:
- उसके पूर्व निर्देशों का गलत अर्थ निकाला जा रहा है
- विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को गलत तरीके से समझा और लागू किया जा रहा है
- इससे अरावली संरक्षण के मूल उद्देश्य को खतरा हो सकता है
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य कभी भी अरावली क्षेत्र को कमजोर करना या संरक्षण से बाहर करना नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
1. न्यायिक निर्देशों की गलत व्याख्या पर चिंता
अदालत ने कहा कि:
“हमारे निर्देशों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा रहा है मानो हमने अरावली संरक्षण को सीमित कर दिया हो, जबकि ऐसा नहीं है।”
2. पर्यावरणीय दृष्टिकोण सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि:
- पर्यावरण संरक्षण संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है
- स्वस्थ पर्यावरण जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है
3. विकास बनाम संरक्षण का संतुलन
अदालत ने यह भी माना कि विकास आवश्यक है, लेकिन:
“विकास ऐसा नहीं होना चाहिए जो पर्यावरण की कीमत पर हो।”
संवैधानिक और विधिक आधार
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का आधार निम्नलिखित संवैधानिक प्रावधान हैं:
- अनुच्छेद 21 – जीवन और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार
- अनुच्छेद 48A – राज्य का पर्यावरण संरक्षण का कर्तव्य
- अनुच्छेद 51A(g) – नागरिकों का पर्यावरण संरक्षण का दायित्व
इसके अलावा, सतत विकास (Sustainable Development), Precautionary Principle और Public Trust Doctrine जैसे सिद्धांत भी लागू होते हैं।
राज्य सरकारों की भूमिका और जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश राज्य सरकारों के लिए स्पष्ट संदेश है कि:
- वे अदालती निर्देशों की मनमानी व्याख्या नहीं कर सकतीं
- अरावली क्षेत्र में किसी भी गतिविधि से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) आवश्यक है
- खनन और निर्माण गतिविधियाँ केवल कानून के दायरे में ही हो सकती हैं
पर्यावरणविदों और समाज की प्रतिक्रिया
इस सूओ मोटो हस्तक्षेप का पर्यावरण विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। उनका मानना है कि:
- इससे अरावली संरक्षण को नया बल मिलेगा
- न्यायपालिका की पर्यावरण–संरक्षण में सक्रिय भूमिका पुनः स्थापित हुई है
- भविष्य में विकास परियोजनाओं पर कड़ी निगरानी संभव होगी
दूरगामी प्रभाव
यह मामला आने वाले समय में:
- अरावली क्षेत्र की स्पष्ट और व्यापक परिभाषा तय करेगा
- पर्यावरणीय मामलों में न्यायिक निगरानी को मजबूत करेगा
- अन्य संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्रों (जैसे पश्चिमी घाट, हिमालय) के लिए भी मार्गदर्शक बनेगा
निष्कर्ष
अरावली हिल्स की संशोधित परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का सूओ मोटो हस्तक्षेप केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतावनी है। यह स्पष्ट करता है कि:
- न्यायालय के निर्देशों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना स्वीकार्य नहीं
- पर्यावरण संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है
- विकास और प्रकृति के बीच संतुलन ही स्थायी भविष्य का रास्ता है
अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जीवन-रेखा है—और इसकी रक्षा करना संवैधानिक, कानूनी और नैतिक दायित्व है।