“अब तो कुत्तों को काउंसलिंग देना ही बाकी रह गया है”: आवारा कुत्तों के आतंक पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी — न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के सवाल
भूमिका
भारत के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) का मुद्दा अब केवल नगरपालिका या पशु-प्रेम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और जीवन के अधिकार से सीधे जुड़ा गंभीर कानूनी-सामाजिक प्रश्न बन चुका है।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की तीखी और व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ सामने आईं, जिन्होंने इस पूरे विवाद की गंभीरता को उजागर कर दिया।
न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा—
“अब तो सिर्फ यही रह गया है कि कुत्तों को काउंसलिंग दे दी जाए कि वे किसी को न काटें।”
वहीं न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने व्यावहारिक सवाल उठाते हुए टिप्पणी की—
“सुबह घर से निकलते समय कोई कैसे जाने कि कौन-सा कुत्ता काटने के मूड में है?”
ये टिप्पणियाँ हल्के-फुल्के अंदाज़ में कही गई प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन इनके पीछे छिपा संदेश बेहद गहरा है— राज्य, नगरपालिकाएँ और नीतिगत ढाँचा नागरिकों को सुरक्षित रखने में विफल हो रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि: आवारा कुत्ते और बढ़ते हमले
पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से—
- बच्चों पर कुत्तों के हमले
- बुजुर्गों और महिलाओं के घायल होने
- यहाँ तक कि कई मामलों में मौत
की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।
इसके बावजूद, स्थानीय प्रशासन अक्सर Animal Birth Control (ABC) Rules और पशु-अधिकार कानूनों के नाम पर निष्क्रियता दिखाता रहा है।
इस विषय पर दायर याचिकाओं में यह तर्क दिया गया कि—
- नसबंदी कार्यक्रम प्रभावी नहीं हैं
- आक्रामक कुत्तों की पहचान और नियंत्रण का कोई ठोस तंत्र नहीं है
- नागरिकों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता
इन्हीं चिंताओं के बीच यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का निहितार्थ
1. “कुत्तों को काउंसलिंग” — एक कटाक्ष
न्यायमूर्ति संदीप मेहता की यह टिप्पणी प्रशासनिक व्यवस्था पर एक तीखा कटाक्ष है।
इसका आशय यह नहीं कि अदालत पशु-अधिकारों को नकार रही है, बल्कि यह संकेत है कि—
- जब नीतियाँ व्यवहारिक नहीं रह जातीं
- जब इंसानों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती
- तब नियम हास्यास्पद स्थिति में पहुँच जाते हैं
अदालत यह बताना चाहती है कि कानून और नियम ज़मीन पर वास्तविक सुरक्षा प्रदान करें, न कि केवल काग़ज़ी आदर्श बने रहें।
2. “कौन-सा कुत्ता काटेगा?” — नागरिक की असहायता
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ का प्रश्न आम नागरिक की रोज़मर्रा की पीड़ा को दर्शाता है।
एक सामान्य व्यक्ति—
- सुबह टहलने निकलता है
- बच्चा स्कूल जाता है
- कोई बुजुर्ग मंदिर या बाज़ार जाता है
तो उसके पास यह जानने का कोई साधन नहीं होता कि—
आज कौन-सा कुत्ता आक्रामक हो सकता है?
यह सवाल राज्य के कर्तव्य पर सीधा प्रहार है, क्योंकि सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और नगर निकायों की जिम्मेदारी है।
संवैधानिक दृष्टिकोण: जीवन का अधिकार बनाम पशु-अधिकार
1. अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत सुरक्षा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को—
- जीवन
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता
- और सुरक्षा
का अधिकार देता है।
सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि—
राज्य का पहला दायित्व नागरिकों के जीवन की रक्षा करना है।
यदि आवारा कुत्तों के कारण नागरिकों की जान जोखिम में है, तो यह सीधा संवैधानिक उल्लंघन है।
2. पशु-अधिकार और मानवीय दृष्टिकोण
वहीं दूसरी ओर—
- पशु-क्रूरता निवारण अधिनियम
- ABC नियम
- और पशु-कल्याण सिद्धांत
यह सुनिश्चित करते हैं कि जानवरों के साथ अमानवीय व्यवहार न हो।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि—
पशु-कल्याण का अर्थ मानव-सुरक्षा की उपेक्षा नहीं हो सकता।
नीतिगत विफलता: कहाँ चूक हो रही है?
1. अप्रभावी नसबंदी कार्यक्रम
कई नगरपालिकाओं में—
- नसबंदी का दावा तो किया जाता है
- लेकिन ज़मीनी स्तर पर संख्या लगातार बढ़ रही है
इससे स्पष्ट है कि कार्यक्रम या तो अधूरे हैं या भ्रष्टाचार से ग्रस्त।
2. आक्रामक कुत्तों की पहचान का अभाव
कानून में यह स्पष्ट नहीं है कि—
- बार-बार हमला करने वाले
- या अत्यधिक आक्रामक
कुत्तों के साथ क्या किया जाए।
परिणामस्वरूप, प्रशासन निर्णय लेने से बचता है।
3. नागरिक शिकायतों की अनदेखी
अक्सर देखा गया है कि—
- शिकायत करने पर
- स्थानीय अधिकारी
- पशु-प्रेमियों और नियमों का हवाला देकर
कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका: संतुलन का प्रयास
इन टिप्पणियों से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट—
- न तो अंधाधुंध कुत्तों को हटाने के पक्ष में है
- न ही ऐसी नीतियों के पक्ष में है जो इंसानों को असुरक्षित छोड़ दें
अदालत संतुलित समाधान चाहती है, जहाँ—
- आक्रामक कुत्तों से नागरिकों की रक्षा हो
- और पशु-अधिकारों का भी अनावश्यक उल्लंघन न हो।
संभावित न्यायिक निर्देश
इस तरह की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट—
- नगरपालिकाओं को स्पष्ट दिशा-निर्देश दे सकता है
- आक्रामक कुत्तों के लिए विशेष प्रोटोकॉल तय कर सकता है
- नसबंदी और पुनर्वास कार्यक्रमों की स्वतंत्र निगरानी का आदेश दे सकता है
- नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात दोहरा सकता है
सामाजिक दृष्टिकोण: भावनाओं से आगे समाधान
यह मुद्दा अक्सर—
- पशु-प्रेम
- बनाम मानव-सुरक्षा
के भावनात्मक द्वंद्व में फँस जाता है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह याद दिलाती है कि—
नीति भावनाओं से नहीं, वास्तविकता से बनती है।
न तो हिंसक उपाय समाधान हैं,
और न ही आँख मूँदकर सब कुछ सहना।
निष्कर्ष
“कुत्तों को काउंसलिंग” और “कौन-सा कुत्ता काटेगा” जैसी टिप्पणियाँ दरअसल भारतीय शासन-प्रणाली के सामने एक आईना हैं।
ये दिखाती हैं कि—
नागरिक आज भी सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित नहीं हैं
स्थानीय प्रशासन जिम्मेदारी टाल रहा है
और कानून ज़मीनी सच्चाई से कटता जा रहा है
सुप्रीम कोर्ट ने व्यंग्य के माध्यम से एक गंभीर संदेश दिया है—
अगर इंसानों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो व्यवस्था पर पुनर्विचार ज़रूरी है।
अंततः,
न तो समाधान कुत्तों को मारना है
और न ही लोगों से डरकर जीने को कहना
समाधान है— स्पष्ट नीति, सख्त क्रियान्वयन और मानव-जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता।