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अजमेर दरगाह और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को राज्य प्रायोजित सम्मान देने के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका: धर्मनिरपेक्षता, राज्य तटस्थता और संवैधानिक बहस

अजमेर दरगाह और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को राज्य प्रायोजित सम्मान देने के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका: धर्मनिरपेक्षता, राज्य तटस्थता और संवैधानिक बहस

         भारत के संवैधानिक इतिहास में एक बार फिर धर्म और राज्य के संबंधों को लेकर गंभीर बहस सामने आई है। हाल ही में भारत का सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर की गई है, जिसमें केंद्र सरकार और उसकी विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रसिद्ध इस्लामी सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती तथा उनसे जुड़ी अजमेर दरगाह को दिए जा रहे राज्य-प्रायोजित औपचारिक सम्मान (State-sponsored ceremonial honor) और प्रतीकात्मक मान्यता (Symbolic Recognition) को चुनौती दी गई है।

         याचिका में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशिष्ट धार्मिक व्यक्तित्व या धार्मिक स्थल को आधिकारिक, औपचारिक और प्रतीकात्मक सम्मान प्रदान कर सकता है, और यदि करता है, तो क्या यह भारत का संविधान की मूल भावना के अनुरूप है?


याचिका का संक्षिप्त विवरण

        याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत किया है कि केंद्र सरकार तथा उसकी विभिन्न इकाइयाँ (Instrumentalities of the State) वर्षों से अजमेर दरगाह और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से संबंधित कुछ धार्मिक परंपराओं और आयोजनों को औपचारिक राज्य सम्मान प्रदान करती रही हैं। इनमें विशेष अवसरों पर चादर चढ़ाने की परंपरा, आधिकारिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति और सरकारी प्रतीकों के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भागीदारी शामिल है।

      याचिका के अनुसार, इस प्रकार की गतिविधियाँ एक विशेष धर्म और धार्मिक परंपरा को राज्य का संरक्षण और मान्यता प्रदान करती हैं, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के विपरीत है।


ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर दरगाह का ऐतिहासिक महत्व

       ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती सूफी परंपरा के महान संत माने जाते हैं। उन्हें “गरीब नवाज़” के नाम से भी जाना जाता है। उनकी दरगाह सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द, प्रेम और मानवता का प्रतीक रही है। विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग अजमेर दरगाह पर श्रद्धा के साथ जाते हैं।

        इतिहास में मुगल शासकों से लेकर आधुनिक भारत तक, कई शासकों और नेताओं ने इस दरगाह के प्रति सम्मान व्यक्त किया है। किंतु याचिका का मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि ख्वाजा साहब का आध्यात्मिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है, बल्कि यह है कि क्या आधुनिक संवैधानिक राज्य को किसी धार्मिक स्थल या संत को आधिकारिक सम्मान देना चाहिए?


याचिका में उठाए गए मुख्य संवैधानिक प्रश्न

याचिका में निम्नलिखित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं:

1. धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत

भारत का संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित करता है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल सभी धर्मों का सम्मान करना ही नहीं, बल्कि राज्य का धार्मिक मामलों में तटस्थ रहना भी है।

2. अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार

यदि राज्य किसी एक धर्म या धार्मिक संस्था को विशेष सम्मान देता है, तो क्या यह अन्य धर्मों के साथ असमान व्यवहार नहीं होगा?

3. अनुच्छेद 25 से 28 – धार्मिक स्वतंत्रता

इन अनुच्छेदों के तहत राज्य को धर्म के प्रचार या समर्थन से दूर रहने की अपेक्षा की जाती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि राज्य-प्रायोजित धार्मिक सम्मान इन प्रावधानों के विपरीत हैं।


राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान: परंपरा या संवैधानिक उल्लंघन?

याचिका में यह भी कहा गया है कि परंपरा के नाम पर किसी असंवैधानिक आचरण को जारी नहीं रखा जा सकता। यदि किसी परंपरा की जड़ें औपनिवेशिक या पूर्व-स्वतंत्रता काल में हों, तो भी उसे संविधान की कसौटी पर परखा जाना आवश्यक है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि:

  • राज्य के प्रतिनिधियों द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों में आधिकारिक रूप से भाग लेना
  • सरकारी संसाधनों का उपयोग धार्मिक आयोजनों में करना
  • धार्मिक प्रतीकों को राज्य की पहचान के साथ जोड़ना

ये सभी कार्य संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना को कमजोर करते हैं।


राज्य और धर्म के संबंध पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

पूर्व में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि भारत की धर्मनिरपेक्षता “सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता” (Positive Secularism) पर आधारित है, जिसका अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान। किंतु न्यायालय ने यह भी कहा है कि राज्य किसी विशेष धर्म का प्रचारक या संरक्षक नहीं बन सकता।

इस याचिका में न्यायालय को यह संतुलन तय करना होगा कि:

  • क्या अजमेर दरगाह को दिया जा रहा सम्मान “सांस्कृतिक परंपरा” के दायरे में आता है?
  • या फिर यह एक विशेष धार्मिक पहचान को राज्य की मान्यता देने जैसा है?

याचिका के संभावित प्रभाव

यदि सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका पर विचार करते हुए कोई व्यापक दिशा-निर्देश देता है, तो इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं:

  1. राज्य की धार्मिक तटस्थता पर स्पष्टता
    भविष्य में राज्य और धर्म के संबंधों को लेकर एक स्पष्ट संवैधानिक सीमा तय हो सकती है।
  2. अन्य धार्मिक स्थलों पर प्रभाव
    यह निर्णय केवल अजमेर दरगाह तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अन्य धार्मिक स्थलों और परंपराओं पर भी लागू हो सकता है।
  3. राज्य-प्रायोजित धार्मिक आयोजनों की समीक्षा
    सरकार द्वारा विभिन्न धर्मों से जुड़े आयोजनों में भागीदारी की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार होगा।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण

याचिका के आलोचक यह तर्क दे सकते हैं कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा में धर्म और संस्कृति को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, अजमेर दरगाह जैसे स्थल केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी रखते हैं।

वहीं, समर्थकों का कहना है कि संविधान लागू होने के बाद राज्य को हर कदम पर धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए, चाहे वह परंपरा कितनी ही पुरानी क्यों न हो।


निष्कर्ष

       अजमेर दरगाह और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जा रहे राज्य-प्रायोजित औपचारिक सम्मान के विरुद्ध दायर याचिका ने एक बार फिर यह मूल प्रश्न खड़ा कर दिया है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में राज्य की भूमिका कहाँ तक होनी चाहिए

        यह मामला केवल एक धार्मिक स्थल या संत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की संवैधानिक आत्मा, धर्मनिरपेक्षता और राज्य की तटस्थता की परीक्षा है। सर्वोच्च न्यायालय का आने वाला निर्णय न केवल इस विवाद का समाधान करेगा, बल्कि भविष्य में राज्य और धर्म के संबंधों को परिभाषित करने में भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है।